रात का आसमान लाल था — जैसे किसी ने उसे खून से रंग दिया हो। हवेली के ऊपर मंडराता धुंध का साया अब और गहरा गया था। बचे हुए सिर्फ तीन लोग थे — आरव, रिया, और डॉ. कबीर। बाकी सभी या तो मर चुके थे... या रहस्यमय तरीके से गायब।
हवेली की दीवारों से अब एक अजीब सी फुसफुसाहट आने लगी थी — जैसे कोई पुरानी आत्मा अपने पुराने पापों को दोहरा रही हो। रिया कांपते हुए बोली,
“आरव... ये टापू अब हमें जाने नहीं देगा...”
डॉ. कबीर ने अपने कंपकंपाते हाथों में एक पुरानी डायरी उठाई — वही डायरी जो उसने तीसरे कमरे के फर्श के नीचे पाई थी। उस पर लिखा था —
‘जो इस टापू पर आए, वे यहाँ के रहस्य का हिस्सा बन जाएँगे...’
1. खून की डायरी
डायरी में उस हवेली के मालिक राजवीर मल्होत्रा का ज़िक्र था — एक पागल वैज्ञानिक, जिसने 50 साल पहले इस टापू पर इंसानों पर प्रयोग किए थे। वह मौत को रोकना चाहता था, लेकिन उसने ज़िंदगी और मौत के बीच की रेखा मिटा दी।
रीया ने पन्ना पलटा।
एक पंक्ति लाल स्याही में लिखी थी —
“मैं उन्हें रोक नहीं सका... अब वे खुद हवेली बन चुके हैं...”
आरव ने हक्का-बक्का होकर पूछा,
“मतलब... ये हवेली जिंदा है?”
कबीर ने धीरे से सिर हिलाया।
“हाँ... और हमें निगलने वाली है।”
2. चीखों की गूंज
रात के ठीक 3 बजे हवेली की बत्तियाँ अपने आप जल उठीं। टेबल पर रखी पुरानी घड़ी की सुइयाँ उलटी दिशा में घूमने लगीं। बाहर हवा में जलने की गंध थी — जैसे किसी ने पुराने ज़माने की आत्माओं को फिर से ज़िंदा कर दिया हो।
रीया को लगा कि उसने किसी को खिड़की से झाँकते देखा। जब वह पास गई, तो वहाँ सिर्फ़ उसका टूटा हुआ प्रतिबिंब था।
वो खुद से डर गई।
अचानक हवेली की छत से किसी के कदमों की आवाज़ आई — धप्प... धप्प... धप्प...
आरव ने टॉर्च जलाई — और वहाँ दीवार पर खून से लिखा था:
“आख़िरी सूर्योदय से पहले... सब ख़त्म हो जाएगा।”
3. तीसरा दरवाज़ा
डॉ. कबीर ने बताया कि हवेली के तीन दरवाज़े हैं —
पहला "जीवन", दूसरा "मृत्यु" और तीसरा "सत्य"।
पहले दो दरवाज़े वो लोग खोल चुके थे, जहाँ से हर बार एक साथी गायब हुआ था।
अब बस तीसरा दरवाज़ा बचा था — “सत्य का दरवाज़ा”।
लेकिन जैसे ही उन्होंने दरवाज़ा खोला, हवेली के सारे आइने टूट गए — और हर आईने से निकल कर वही चेहरा दिखा... राजवीर मल्होत्रा का।
वो बोला —
“तुम सब अब मेरे प्रयोग का हिस्सा हो... तुम में से एक, मेरा उत्तराधिकारी बनेगा...”
हवेली हिलने लगी। फर्श के नीचे से आवाज़ आई — “सिर्फ एक ही बचेगा…”
4. टापू का शाप
सुबह की पहली किरण के साथ टापू ने अपना असली रूप दिखाया।
वो कोई साधारण जगह नहीं थी — वो मृत आत्माओं का कैदखाना थी।
रीया ने आरव की तरफ देखा,
“अगर यहाँ से कोई जाएगा, तो सिर्फ़ एक...”
आरव की आँखों में आँसू थे — लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
कबीर ने झटके से अपने बैग से एक पुरानी इंजेक्शन शीशी निकाली — वही जो राजवीर ने मौत को हराने के लिए बनाई थी।
“ये वही सीरम है... जो ज़िंदगी देता भी है और ले भी सकता है।”
रीया चिल्लाई — “मत करो, कबीर!”
पर तब तक उसने वो सीरम आरव की नसों में डाल दिया।
5. अंत... या शुरुआत?
आरव ज़मीन पर गिरा, लेकिन अगले ही पल उसकी साँसें चलने लगीं — पर आँखों का रंग अब काला था।
वो धीरे-धीरे मुस्कुराया।
“अब ये हवेली मेरी है।”
कबीर पीछे हटा,
“तुम... तुम इंसान नहीं रहे!”
आरव ने हवेली की ओर देखा — और हवेली ने उसकी ओर।
जैसे दोनों एक-दूसरे के प्रतिबिंब बन गए हों।
रीया चीखती हुई भागी, लेकिन हवेली के दरवाज़े अपने आप बंद हो गए।
बाहर टापू के ऊपर लाल सूरज उगा — जैसे किसी ने फिर से खून बहाया हो।
और फिर, शांति... लेकिन सिर्फ़ ऊपर से। क्योंकि हवेली के नीचे, कुछ नया जन्म ले चुका था...
आरव मल्होत्रा — हवेली का नया मालिक।
🩸 “रहस्यमयी टापू” — भाग 7 समाप्त
(लेकिन कहानी नहीं... क्योंकि अगली रात, टापू पर फिर से लॉटरी के टिकट बिखरे पाए गए…)


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