🩸 रहस्यमयी टापू – भाग 10 : आख़िरी आत्मा

सूरज की पहली किरण उस टापू पर सालों बाद पड़ी थी।

धुंध हट चुकी थी।

हवेली की दीवारें अब राख में बदल चुकी थीं।


लेकिन... टापू अब भी ज़िंदा था।

हर लहर, हर हवा, हर आवाज़ में अब भी कुछ बोलता था —


 “कहानी अभी पूरी नहीं हुई…”



1. खून का साया लौट आया

सालों बाद, समुद्र किनारे बसे एक छोटे कस्बे में कुछ नौजवान लड़के-लड़कियाँ आए।

उनमें से एक थी नैना, जो रिया की परपोती थी।

उसे बचपन से उस “रहस्यमयी टापू” की कहानियाँ सुनने का शौक था।

पर उसने कभी नहीं सोचा था कि वो एक दिन खुद वहाँ जाएगी।


कस्बे के मछुआरे अब भी टापू की तरफ़ जाने से डरते थे।

वे कहते थे —


> “हर सौ साल बाद खून का चाँद फिर उगता है, और हवेली किसी को बुलाती है…”


उसी रात, जब आसमान फिर से लाल हुआ, नैना के सपने में एक आवाज़ आई —


 “आओ... खेल अधूरा है…”


2. यात्रा की शुरुआत

नैना अपने दोस्तों अभि, सौरव, तान्या, और वीर के साथ नाव लेकर टापू की ओर निकली।

समुद्र का पानी जैसे उन्हें धकेल रहा था, रोकने की कोशिश कर रहा था।

जैसे ही उन्होंने किनारे कदम रखा, हवाओं में फिर वही सन्नाटा उतर आया।

पुरानी हवेली अब भी वहीं थी — टूटी हुई, पर ज़िंदा।


हवेली के दरवाज़े पर धूल से ढकी एक पट्टिका पड़ी थी —


 “यहाँ हर आत्मा का स्वागत है — बस एक बार।”


3. खेल का दुबारा शुरू होना

अंदर पहुँचते ही एक पुरानी घड़ी अपने आप चलने लगी —

“12:00 AM”

और एक आवाज़ आई —


 “खेल शुरू हो गया है... पाँच आए हैं, पर लौटेगा सिर्फ़ एक।”


रोशनी बुझ गई।

हवेली का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।


हर कमरे में अजीब परछाइयाँ घूमने लगीं।

तान्या ने दीवार पर कुछ लिखा देखा —


 “तुम्हारी आत्मा पहले से यहाँ है।”


सौरव डर के मारे चीखा,

“ये जगह… ये जिंदा है!”


उसी पल उसका शरीर दीवार में समा गया — और एक चीख गूँज उठी जो कई सालों तक खत्म नहीं हुई।


4. हवेली की सच्चाई

नैना और अभि नीचे के तहखाने में पहुँचे।

वहीं उन्हें एक पुराना यंत्र मिला — वही जो रिया ने नष्ट किया था, “जीवन मशीन।”

पर अब वो दोबारा सक्रिय हो चुकी थी।


स्क्रीन पर लिखा था —

“रीया की आत्मा अधूरी है। जो भी उसकी वंशज है, वही इसे खत्म कर सकती है।”


नैना काँप उठी।

“मैं उसकी वंशज हूँ… तो क्या ये मेरी नियति है?”


अभि ने उसका हाथ थामा —

“अगर ये कहानी तुम्हारी परदादी ने शुरू की थी, तो इसका अंत भी तुम करोगी।”


5. अंतिम बलिदान

हवेली अब हिलने लगी थी।

हर आत्मा, हर परछाई बाहर निकल रही थी — आरव की आत्मा, राजवीर मल्होत्रा, और वे सभी जिनका नाम मिट चुका था।


उन सबमें एक आकृति थी — रीया।

उसकी आँखों में अब भी वही उदासी थी।

वो बोली,


 “नैना... तू मेरा अधूरा अध्याय है। मेरा अंत कर।”


नैना ने मशीन पर हाथ रखा।

“माँ, अब ये कहानी खत्म होगी।”


उसने मशीन की कोर वायर अपने दिल से जोड़ दी — और अपने खून की आखिरी बूँद बहाई।


पूरा टापू हिल उठा।

हवेली आग की तरह जल उठी।

आसमान में खून का चाँद धीरे-धीरे सफ़ेद हो गया।


6. नई सुबह

जब सब खत्म हुआ, नैना ने अपनी आँखें खोलीं।

वो समुद्र किनारे थी — अकेली।

टापू अब पूरी तरह समंदर में समा चुका था।

दूर बस लहरें थीं, और हवा में एक हल्की मुस्कान।


उसने रेत पर देखा —

एक छोटी सी लकड़ी की गुड़िया रखी थी, जिस पर लिखा था —


 “धन्यवाद… अब हम आज़ाद हैं।”


7. आखिरी मोड़

कई साल बाद, उसी कस्बे के संग्रहालय में एक प्रदर्शनी लगी —

“The Lost Island – Mystery of Riya Malhotra.”


एक बच्चा वहाँ आया, उसने एक पुरानी डायरी उठाई और माँ से पूछा,


 “माँ, क्या ये सच में हुआ था?”


माँ ने मुस्कुराकर कहा,


 “कहते हैं कहानियाँ झूठ होती हैं… पर कुछ झूठ ऐसे होते हैं जो हर सौ साल बाद दोहराए जाते हैं।”


कैमरा धीरे-धीरे उस डायरी के आखिरी पन्ने पर ज़ूम करता है 


 “जो भी इसे पढ़ेगा… खेल फिर शुरू होगा।”


स्क्रीन ब्लैक होती है —


 “रहस्यमयी टापू – समापन”

(या शायद… एक नई शुरुआत) 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ