खिलौने वाला

प्रस्तावना

यह कहानी उस छोटे से शहर की है, जहाँ लोग अब अंधेरा होने के बाद बच्चों को बाहर भेजने से डरने लगे थे। वजह? लगातार होने वाली गायबियाँ।

हर बार जब कोई बच्चा गायब होता, उसके घर के बाहर या उसके कमरे में एक अजीब सा खिलौना मिलता – लकड़ी का बना, पर उसकी आँखें ऐसे चमकतीं मानो ज़िंदा हों।


माता-पिता कहते –

“ये खिलौने कहीं से आते हैं… न जाने कौन रख जाता है।”

लोगों में खौफ़ फैल गया। औरतें बच्चों को कसकर बाँध लेतीं, मगर फिर भी कोई न कोई बच्चा बिना आवाज़ के ग़ायब हो जाता।


पहला अध्याय – डर का शहर

यह शहर पहले शांत था। मगर अब हर गली में सन्नाटा था। शाम ढलते ही दरवाज़े बंद हो जाते।


लोग कहते –

“ये सिर्फ अपहरण नहीं है… इसके पीछे कुछ और है।”

कुछ माँ-बाप ने बताया कि बच्चों ने रात को “खिलौनों से बात करने” की बात कही थी।

किसी ने सुना कि बच्चे कहते – “खिलौना हमें बुला रहा है खेलने।”

मगर सवाल यह था – ये खिलौने आखिर आते कहाँ से थे?


दूसरा अध्याय – पहली गवाही

एक औरत ने पुलिस को बताया –

“मेरे बेटे के कमरे में एक गुड्डा मिला। उसने कहा कि वह उससे बातें करता है। गुड्डे ने कहा कि अगर वह दरवाज़ा खोले तो उसे बहुत मज़ा आएगा। मैंने उस गुड्डे को जलाने की कोशिश की… मगर वह आग में भी नहीं जला।”

पुलिस ने गुड्डा लिया, पर अगले दिन वह गुड्डा सबूतों से गायब हो गया।


तीसरा अध्याय – जाँच शुरू

पुलिस की जाँच रुकती जा रही थी। कोई गवाह नहीं, कोई सबूत नहीं।

सिर्फ एक पैटर्न था – खिलौने और बच्चों की गुमशुदगी।


तभी शहर में एक मनोवैज्ञानिक प्रोफेसर आईं – डॉ. संध्या मेहरा

उन्होंने कहा –

“यह सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि किसी बीमार दिमाग़ की सोच है। कोई ऐसा है जो खिलौनों को हथियार बना रहा है।”


चौथा अध्याय – डरावने खिलौने

रात को लोगों के घरों में खिलौने अपने आप आ जाते।

किसी के आँगन में लकड़ी का घोड़ा पड़ा मिला।

किसी के दरवाज़े पर हँसता हुआ जोकर।

किसी की खिड़की पर बैठा रोता हुआ गुड्डा।

इन खिलौनों की आँखें ऐसे लगतीं जैसे किसी इंसान की आत्मा उनमें कैद हो।


डर बढ़ता जा रहा था। बच्चे अब बिस्तर में सोने से भी डरने लगे थे।


पाँचवाँ अध्याय – परछाई

एक रात, एक बूढ़े आदमी ने दावा किया कि उसने देखा –

“कोई आदमी आधी रात को गली में चलता है। उसके हाथ में बोरा होता है और पीछे से खिलौनों की खड़खड़ाहट सुनाई देती है। पर उसका चेहरा कभी साफ़ नहीं दिखता।”


लोगों ने उसे “खिलौनों का साया” नाम दिया।


छठा अध्याय – मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

डॉ. संध्या ने समझाया –

“यह आदमी सामान्य नहीं है। वह खिलौनों का इस्तेमाल बच्चों को आकर्षित करने के लिए करता है। उसके दिमाग में यह जुनून है कि खिलौने ज़िंदा हो सकते हैं।”


उन्होंने पुलिस से कहा कि उसे ढूँढने के लिए शहर के पुराने इलाकों, छोड़े हुए गोदामों और कारखानों को खंगालना होगा।


सातवाँ अध्याय – डर की गहराई

खिलौनों का आतंक बढ़ता गया।

एक और बच्ची गायब हुई। उसके कमरे में सिर्फ एक लकड़ी की गुड़िया मिली जिसकी आँख से खून जैसा लाल रंग बह रहा था।

एक लड़का स्कूल से लौटते वक्त गायब हो गया। उसके बैग में एक छोटा सा यांत्रिक पुतला रखा मिला।


लोगों ने कहना शुरू किया –

“ये कोई इंसान नहीं… ये तो शैतान है।”


आठवाँ अध्याय – गोदाम का राज़

आख़िरकार, पुलिस और डॉ. संध्या को शहर के किनारे एक पुराना गोदाम मिला।


अंदर घुसते ही, उनकी साँसें रुक गईं।

हज़ारों खिलौने पंक्तियों में रखे थे। हर खिलौने की आँखें उन्हें घूर रही थीं। कुछ खिलौने हँस रहे थे, कुछ रो रहे थे।


दीवारों पर बच्चों की तस्वीरें टंगी थीं – वही बच्चे जो गायब हुए थे।


यह सिर्फ एक दुकान नहीं… यह एक क़ब्रगाह थी।


नौवाँ अध्याय – सच्चाई का पर्दाफ़ाश

जब सब लोग डर से जमे खड़े थे, तभी गोदाम के अंधेरे कोने से एक धीमी हँसी सुनाई दी।


“तुम आखिर आ ही गए…”


एक दुबला-पतला आदमी छाया से बाहर आया। उसके हाथ में एक अधूरा खिलौना था।

“मैंने इन्हें बनाया है। ये सब खिलौने मेरे बच्चे हैं। हर बच्चा… मेरे आरव का टुकड़ा है।”

सब हैरान रह गए। यही था वह – खिलौनों वाला।

शहर का कभी मशहूर खिलौना बनाने वाला, जिसने अपने बेटे को आग में खो दिया था और अब हर बच्चे में उसे खोज रहा था।


दसवाँ अध्याय – अंतिम सामना

डॉ. संध्या बोलीं –

“तुम बीमार हो। ये बच्चे तुम्हारा बेटा नहीं हैं।”


वह पागल होकर चिल्लाया –

“चुप रहो! तुम नहीं समझोगे… जब सारे टुकड़े जुड़ेंगे, मेरा आरव लौट आएगा!”

उसने खिलौनों की कतार में आग लगा दी। खिलौने चीखने लगे जैसे उनमें आत्माएँ फँसी हों।

पुलिस ने उसे काबू किया, लेकिन उसकी आँखों में अब भी वही पागलपन था।


उपसंहार

खिलौने वाला पकड़ा गया, पर शहर का डर खत्म नहीं हुआ।

क्योंकि कहा जाता है, उस रात जब उसके खिलौनों को जलाया गया – कुछ खिलौनों ने हिलना-बोलना बंद नहीं किया।


आज भी, लोग कहते हैं कि अगर देर रात कोई बच्चा अकेला गली में निकले… तो उसके सामने एक खिलौना गिरता है और पीछे से एक आवाज़ आती है –


“बच्चे… खेलोगे?”


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