Part 1 – "हवेली का पहला दरवाज़ा"
भैरवपुर गाँव, उत्तर भारत के पहाड़ों के बीच बसा हुआ, देखने में तो बेहद साधारण लगता था—
कुछ दर्जन घर, टेढ़ी-मेढ़ी गलियाँ, एक पुराना कुआँ और खेत।
लेकिन जब सूरज ढलता, तो पूरा गाँव किसी कफ़न में लिपटा सा लगने लगता।
गाँव के बच्चे कभी शाम ढलने के बाद बाहर नहीं निकलते थे।
बुज़ुर्ग अक्सर दीपक बुझाने से पहले खिड़कियाँ कसकर बंद कर देते थे।
औरतें मंदिर में घंटियाँ बजातीं और दरवाज़े पर गोबर से “ॐ” बना देतीं।
सब जानते थे कि जब रात होती है, तब इस गाँव की हवा भी किसी और की होती है।
गाँव के बीचों-बीच खड़ी थी वो हवेली—
भैरव हवेली।
टूटी छतें, जंग लगे दरवाज़े, और दीवारों पर चढ़ी काई, जैसे हर ईंट सौ साल पुराना ज़ख्म समेटे हो।
गाँव वाले कहते थे कि हवेली ज़िंदा है।
वो सांस लेती है, गुस्सा करती है, और कभी-कभी… भूखी भी हो जाती है।
2. शहर से आए मेहमान
शहर से दो लोग इस गाँव पहुँचे थे।
अयान – 24 साल का, फोटोग्राफर और यूट्यूबर।
रिया – 23 साल की, उसकी दोस्त और रिसर्चर।
दोनों का मक़सद था हवेली की सच्चाई पर डॉक्यूमेंट्री बनाना।
अयान को हमेशा अलौकिक चीज़ों का शौक़ रहा था। वो मानता था कि हर कहानी के पीछे कोई न कोई सच छिपा होता है।
रिया इसके उलट, हर चीज़ को तर्क से देखती थी। उसके लिए भूत-प्रेत सिर्फ़ इंसानों की कल्पना थे।
गाँव पहुँचकर दोनों ने कई लोगों से बात की।
लेकिन लोग हवेली का नाम सुनते ही या तो चुप हो जाते या नज़रें झुका लेते।
आख़िरकार, एक बूढ़ा आदमी मिला—अरिजीत।
उसकी आँखें धंसी हुई थीं, जैसे सालों से नींद न मिली हो।
उसने धीमे स्वर में कहा—
“बेटा, हवेली के दरवाज़े मत खोलना। वो दरवाज़े… बाहर नहीं, अंदर की ओर खुलते हैं। और जो अंदर चला जाता है, उसका रास्ता कभी बाहर नहीं आता।”
अयान मुस्कराया, “बाबा, यही तो सच हम कैमरे पर दिखाना चाहते हैं।”
अरिजीत ने उसकी तरफ़ देखा, और सिर्फ़ एक शब्द कहा—
“श्राप।”
3. हवेली का पहला दृश्य
शाम ढल रही थी जब अयान और रिया हवेली के सामने खड़े हुए।
हवेली का मुख्य दरवाज़ा आधा टूटा था।
ऊपर लटकती हुई खिड़की बार-बार हवा में हिल रही थी, मानो कोई अंदर से झाँक रहा हो।
अयान ने कैमरा ऑन किया और बोला—
“दोस्तों, हम खड़े हैं भैरव हवेली के सामने। कहते हैं कि यहाँ सौ सालों से मौत का साया है। आज हम आपको वो सच दिखाएँगे जो शायद दुनिया ने कभी न देखा हो।”
रिया ने उसके हाथ पर हाथ रखा।
“अयान, ये ठीक नहीं है। मुझे यहाँ बहुत अजीब लग रहा है।”
अयान ने मुस्कराकर कहा,
“भूत जैसी कोई चीज़ नहीं होती। चलो।”
जैसे ही उन्होंने दरवाज़ा धक्का देकर खोला, एक ठंडी हवा का झोंका बाहर निकला।
रिया काँप उठी।
“ये हवा… बाहर से नहीं थी। ये अंदर से निकली है।”
4. हवेली के भीतर
अंदर कदम रखते ही दोनों को सन्नाटे ने घेर लिया।
चारों तरफ़ जाले, टूटी कुर्सियाँ और बिखरे काँच।
दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे, जिनमें अजीब चेहरे बने थे।
अचानक पीछे से दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
धड़ाम!
रिया चीख पड़ी।
“अयान!! किसने दरवाज़ा बंद किया?”
अयान ने हिम्मत दिखाने की कोशिश की।
“शायद हवा से… चिंता मत करो।”
लेकिन दोनों जानते थे कि हवा इतनी तेज़ नहीं थी।
कमरे के बीच एक लकड़ी की मेज़ रखी थी।
उस पर एक पुरानी डायरी रखी थी।
धूल हटाकर अयान ने खोली।
पहले पन्ने पर खून जैसे दाग से लिखा था—
“अगर तुम ये पढ़ रहे हो, तो तुम अगली कहानी का हिस्सा बन चुके हो।”
रिया ने तुरंत डायरी उसके हाथ से खींच ली।
“ये सब गाँव वालों का ड्रामा है।”
लेकिन तभी… ऊपर की मंज़िल से पैरों की आहट आई।
धीरे-धीरे… ठक… ठक… ठक…
5. पहला डर
अयान ने टॉर्च ऊपर की ओर फैलाई।
सीढ़ियाँ टूटी हुई थीं। पर उन पर धूल नहीं थी।
ऐसा लग रहा था जैसे कोई रोज़ उन पर चलता हो।
रिया ने डरते हुए कहा,
“अयान, हमें बाहर निकलना चाहिए।”
लेकिन अयान की जिज्ञासा बढ़ चुकी थी।
“सोचो रिया, अगर यहाँ सच में कोई है, तो हमारी डॉक्यूमेंट्री हिट हो जाएगी।”
दोनों सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।
ऊपर का कमरा आधा खुला था।
जैसे ही दरवाज़ा धकेला…
कमरे में एक टूटी हुई झूला-कुर्सी थी।
उस पर धूल जमा थी।
लेकिन… वो हिल रही थी।
बिना किसी के बैठने के।
6. हवेली की आवाज़ें
रिया काँप उठी।
“यहाँ कोई है…”
अचानक कमरे की दीवार पर कुछ लिखा हुआ नज़र आया।
धीरे-धीरे काले धुएँ से अक्षर उभरे:
“तुम देर से आए हो। हम इंतज़ार कर रहे थे।”
रिया चीख उठी और अयान का हाथ पकड़ लिया।
“अयान, अब बस। हम यहाँ से निकल रहे हैं।”
अयान कुछ कहता, उससे पहले कमरे की झूला-कुर्सी जोर से हिली और गिर गई।
कमरा अंधेरे से भर गया।
और उसी अंधेरे में, एक परछाईं खड़ी थी।
लंबी, दुबली, चेहरे पर कोई शक्ल नहीं।
बस आँखें—गहरी, लाल और जली हुई।
7. अंत नहीं, शुरुआत
रिया ने अयान को खींचा और दोनों भागकर सीढ़ियाँ उतरे।
उन्होंने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।
लेकिन दरवाज़ा बाहर की ओर नहीं खुला।
कितना भी धक्का देते, वो सिर्फ़ अंदर की ओर खुलता था।
रिया चिल्लाई—
“ये बाहर क्यों नहीं खुल रहा?”
अयान ने काँपते हुए कहा—
“अरिजीत… सही कह रहा था। ये दरवाज़े बाहर नहीं, अंदर की ओर खुलते हैं…”
और तभी… पीछे से वही आवाज़ गूँजी—
"अब तुम भी यहीं के हो।"
To be continue.......


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