1. डर और शक की रात
हवेली अब मौत की गिनती कर रही थी। पाँच लोग बचे थे—मनोज, सोनल, शिवानी, राघव और कबीर।
लेकिन अब उनके बीच एक ऐसा खौफ़ था जो बाहर के अंधेरे से भी ज्यादा गहरा था।
हर कोई एक-दूसरे को शक की नज़रों से देख रहा था।
मनोज बार-बार कहता, “हम सबको एक साथ रहना चाहिए।”
शिवानी चिल्लाती, “तू ही तो है जो हमें फँसा रहा है।”
सोनल चुप थी, उसकी आँखों में कोई रहस्य छिपा था।
उस रात हवेली के बड़े हॉल में एक चीख गूँजी। सब भागकर पहुँचे तो देखा—राघव का गला काटकर उसकी लाश झूमर के नीचे पड़ी थी।
दीवार पर ख़ून से लिखा था –
“अब चार बचे हो।”
2. हवेली के आईने का खेल
अगली सुबह सोनल ने हवेली के पुराने कमरे में बड़े-बड़े आईने देखे।
लेकिन जैसे ही सबने उनमें झाँका, हर किसी का चेहरा अलग दिखा।
कबीर ने देखा कि उसके आईने में वही खड़ा है लेकिन चेहरे पर खून से सना हुआ चाकू है।
शिवानी का आईना उसे हँसते हुए दिखा रहा था जबकि वह खुद रो रही थी।
अचानक एक आईना टूट गया और उसके पीछे से खून से भीगा हुआ एक मुखौटा गिरा। मुखौटे पर लिखा था –
“सच अब करीब है।”
3. हवेली की औरत का दूसरा चेहरा
रात होते ही वही सफेद साड़ी वाली औरत फिर सामने आई। लेकिन इस बार उसका चेहरा पूरी तरह दिखाई दे रहा था।
वह बोली –
“जिसे तुम भूत समझ रहे हो, वो सिर्फ तुम्हारे डर का रूप है। असली हत्यारा इंसान है… और वही इंसान इस हवेली को अपने खेल का मैदान बना चुका है।”
सोनल ने हिम्मत करके पूछा –
“कौन है वो?”
औरत ने धीरे-धीरे चारों बचे लोगों की तरफ इशारा किया… लेकिन उसकी उँगली कबीर पर रुक गई।
कबीर घबरा गया –
“ये झूठ है! मैं कातिल नहीं हूँ।”
4. तहखाने का सच
मनोज ने कबीर पर शक करते हुए सबको तहखाने में खींच लिया।
तहखाने में उन्होंने पुराने बक्से खोले।
बक्सों में खून से सने खिलौने, बच्चों के कपड़े और पुराने अखबार थे।
अखबारों की सुर्खियाँ चौंकाने वाली थीं –
“कई सालों से रहस्यमय हत्याएँ – बच्चों के गायब होने की घटनाएँ।”
“टापू की हवेली में मौत का खेल।”
लेकिन आखिरी अखबार पर सबसे बड़ा राज़ लिखा था –
“मुख्य संदिग्ध – कबीर।”
5. कबीर का काला चेहरा
अब सब कबीर को घूर रहे थे।
कबीर हँस पड़ा। उसकी हँसी हवेली में गूँज उठी।
“तुम सबको सच जानना है? हाँ, मैं ही हूँ वो जिसने इस हवेली को अपना खेल बना दिया। हर बार लोग यहाँ आते हैं और मैं उन्हें खिलौनों की तरह इस्तेमाल करता हूँ।”
उसकी आँखों में पागलपन था।
“ये हवेली मेरा खेल का मैदान है। दीवारों पर लिखा खून? वो सब मेरा काम है। और जो औरत तुम देखते हो, वो तुम्हारे डर की परछाई है।”
6. मौत का आखिरी खेल
कबीर ने चाकू निकाल लिया और बोला –
“अब बचा कौन? तीन लोग। लेकिन इस खेल का अंत मेरे हाथ में है।”
मनोज और शिवानी डर के मारे पीछे हट गए।
सोनल ने काँपते हुए कहा –
“कबीर, तू इंसान नहीं है… तू शैतान है।”
कबीर गरजा –
“हाँ, मैं ही इस हवेली का शैतान हूँ!”
उसने हमला किया, लेकिन तभी हवेली के झूमर से लोहे की भारी जंजीर टूटी और कबीर पर गिर पड़ी।
कबीर वहीं ज़मीन पर गिर पड़ा, उसका शरीर तड़पता रहा और फिर चुप हो गया।
7. हवेली की चुप्पी
तीनों ने सोचा कि अब सब खत्म हो गया।
लेकिन तभी दीवार पर ख़ून से एक नया संदेश लिखा उभरा –
“खेल खत्म नहीं हुआ… असली शैतान अभी भी जिंदा है।”
सबकी साँसें रुक गईं।
क्या सच में कबीर ही असली कातिल था?
या फिर कोई और… जो अब तक परछाइयों में छिपा था?
🔥 भाग 5 का अंत – लेकिन कहानी अभी बाकी है।


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