हवेली का स्वागत
दसों लोग उस हवेली में कदम रखते ही सिहर उठे।
अंदर घुप्प अंधेरा था। बस दीवारों पर लगी टिमटिमाती मोमबत्तियाँ रोशनी दे रही थीं।
जैसे ही उन्होंने मुख्य हॉल में प्रवेश किया, अचानक दरवाज़ा अपने आप ज़ोर से बंद हो गया।
सबके चेहरों पर डर साफ झलक रहा था।
दीवार पर लगी एक बड़ी घड़ी ने अचानक आवाज़ की—
“टिक-टिक-टिक…”
और साथ ही हवेली में गूंजती हुई एक रहस्यमयी आवाज़ सुनाई दी –
"तुम सबका स्वागत है। अब तुम इस टापू के कैदी हो। हर रात, तुममें से एक मरेगा। और जब तक सच सामने नहीं आएगा, कोई बचकर नहीं जाएगा।"
पहली रात की दहशत
सभी लोग चुपचाप एक-दूसरे को देखने लगे।
कविता (गृहिणी) ने कांपते हुए कहा –
“हे भगवान… ये कैसी जगह है? हमें वापस जाना है।”
जयदीप (पुलिस इंस्पेक्टर) ने कड़क आवाज़ में कहा –
“सबको शांत रहना होगा। ये ज़रूर किसी का खेल है। मैं जान जाऊँगा कि इसके पीछे कौन है।”
विक्रम (बिज़नेसमैन) ने हंसते हुए कहा –
“अरे इंस्पेक्टर साहब, कभी-कभी दुनिया में ऐसे खेल भी होते हैं जिनके पीछे कोई इंसान नहीं… बल्कि कुछ और होता है।”
उसकी आवाज़ में मज़ाक था, लेकिन आँखों में हल्की घबराहट।
मृत्यु का पहला शिकार
रात को सबको हवेली के अलग-अलग कमरों में ठहराया गया।
अंधेरी हवेली में खिड़कियों से आती हवा, और दरवाज़ों की चरमराहट, नींद तो दूर—किसी को चैन से बैठने भी नहीं दे रही थी।
करीब आधी रात, अचानक एक चीख सुनाई दी।
सब लोग दौड़कर हॉल में इकट्ठा हुए।
वहाँ, ज़मीन पर राजीव (बेरोज़गार नौजवान) की लाश पड़ी थी। उसकी गर्दन पर अजीब से नीले निशान थे, जैसे किसी ने रस्सी या तार से उसका गला घोंट दिया हो।
अनन्या (मेडिकल स्टूडेंट) ने झुककर लाश देखी और कांपते हुए कहा –
“ये… ये प्राकृतिक मौत नहीं है। किसी ने इसे गला दबाकर मारा है।”
सन्नाटा छा गया।
अमृता (पत्रकार) ने कैमरा उठाकर सब रिकॉर्ड किया और बोली –
“मतलब, जो आवाज़ हमें सुनाई दी थी, वो सच थी। हर रात… एक मौत होगी।”
शक की बुनियाद
सब लोग एक-दूसरे को शक की नज़र से देखने लगे।
जयदीप बोला –
“यहाँ कोई हत्यारा हमारे बीच ही है। और वो हम सबको खेल की तरह मार रहा है।”
विक्रम ने उसकी ओर देखते हुए कहा –
“तो इंस्पेक्टर साहब, क्यों न हम आपसे ही पूछ लें? कानून के रक्षक अक्सर… खेल बिगाड़ने वाले भी निकलते हैं।”
जयदीप गुस्से से गरज पड़ा –
“चुप रहो विक्रम! अगर मैं चाहता तो भागकर इस टापू से निकलने की कोशिश करता। लेकिन मैं यहाँ सच्चाई पता लगाऊँगा।”
हवेली का रहस्यमयी कमरा
सुबह हुई तो सबने हवेली की तलाश शुरू की।
कबीर (फोटोग्राफर) ने एक पुराना लकड़ी का दरवाज़ा खोला, जो आधा टूटा हुआ था।
भीतर एक अंधेरी कोठरी थी, जिसकी दीवारों पर पुराने चित्र बने थे।
उन चित्रों में भी दस लोग दिखाए गए थे, और हर चित्र के नीचे एक लाल क्रॉस का निशान था।
अभी तक सिर्फ़ एक चित्र पर क्रॉस था।
राजीव की मौत वाली जगह।
“मतलब… ये खेल बहुत पहले से तय है।” – राघव (प्रोफ़ेसर) ने फुसफुसाकर कहा।
“और इसका स्क्रिप्ट पहले ही लिखा जा चुका है।”
दूसरा खून
रात फिर आई।
इस बार सबने तय किया कि वे अलग-अलग नहीं, बल्कि एक हॉल में साथ रहेंगे।
मोमबत्तियों की हल्की रोशनी, चारों ओर डर का सन्नाटा।
अचानक, बिजली जैसी तेज़ गड़गड़ाहट हुई और हवेली के झूमर से एक लोहे की जंजीर टूटकर गिरी।
सीधे सोनाली (मॉडल) पर।
उसकी चीख सुनाई दी और पल भर में उसका शरीर खून से लथपथ हो गया।
सब लोग सकते में रह गए।
अमृता काँपते हुए बोली –
“ये… हादसा नहीं हो सकता। ये बहुत सुनियोजित हत्या है।”
जयदीप ने सबकी ओर देखा और बोला –
“अब हमें मान लेना चाहिए। हत्यारा यहीं है। और वो हम सबको एक-एक करके मार रहा है।”
डर का खेल
अब हवेली का हर कोना मौत की दस्तक जैसा लगने लगा।
लोगों ने खाना-पीना छोड़ दिया, बस किसी तरह ज़िंदा रहने की कोशिश करने लगे।
लेकिन हवेली की घड़ी हर बार आधी रात को टिक-टिक की आवाज़ के साथ एक डरावनी घंटी बजाती।
और उसके बाद… मौत का नया शिकार सामने आता।
✨ भाग 2 का अंत –
अब तक दो मौतें हो चुकी थीं।
लेकिन ये कत्ल कौन कर रहा है?
क्या ये सचमुच हवेली का श्राप है, या किसी इंसान का खूनी खेल?


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