रहस्यमयी टापू – भाग 3 रहस्यों के गहराते साये


डर का साया

सोनाली की मौत ने सबको भीतर तक हिला दिया।

अब हवेली का हर कोना मौत की आहट जैसा लग रहा था।

दीवारों पर परछाइयाँ काँपतीं और टिमटिमाती मोमबत्तियों की लौ जैसे किसी अनजाने राज़ की गवाही दे रही हो।


कविता (गृहिणी) ने काँपती आवाज़ में कहा –

“हम सब यहाँ मरने वाले हैं। कोई हमें नहीं बचाएगा।”


विक्रम (बिज़नेसमैन) झुंझलाकर बोला –

“चुप रहो! डर से मौत और तेज़ी से आती है। हमें रास्ता ढूँढना होगा।”


जयदीप (इंस्पेक्टर) ने सबको शांत कराते हुए कहा –

“मैंने जगह-जगह निशान देखे हैं। हवेली के नीचे कोई गुप्त तहख़ाना है। वहाँ ज़रूर कुछ छिपा है।”



तीसरा कत्ल

रात गहराने लगी। सबने तय किया कि वे फिर से हॉल में साथ रहेंगे।

मोमबत्तियों की लौ के बीच, हर किसी की आँखें डरी हुई पर जागती हुई थीं।


करीब आधी रात, अचानक कमरे में ज़बरदस्त ठंडी हवा चली और मोमबत्तियाँ बुझ गईं।

अंधेरे में सिर्फ़ एक चीख सुनाई दी—


“आआआह्ह्ह…!”


जब रोशनी जलाई गई तो कबीर (फोटोग्राफर) ज़मीन पर पड़ा था।

उसकी आँखें फटी रह गई थीं, और कैमरे का पट्टा उसकी गर्दन में कसकर लपेटा गया था।


अनन्या (मेडिकल स्टूडेंट) ने लाश देखी और सहमते हुए बोली –

“ये… ये काम बेहद सटीक है। हत्यारा बहुत पास ही था… शायद हमारे बीच।”


अमृता (पत्रकार) काँपते हुए बोली –

“मतलब… हमें जिस पर भरोसा है, वही हत्यारा हो सकता है।”


अब शक का दायरा और गहरा हो गया।



आपसी शक और टूटते रिश्ते

सुबह होते ही सबने आपस में बहस शुरू कर दी।


राघव (प्रोफ़ेसर) ने गुस्से से कहा –

“ये इंस्पेक्टर ही कातिल है। हर मौत के बाद ये सबसे पहले पहुँच जाता है।”


जयदीप गरजा –

“चुप रहो! अगर मैं कातिल होता तो कब का तुम सबको खत्म कर चुका होता।”


विक्रम ने बीच में कहा –

“नहीं… असली कातिल वो है, जो चुप है। ये अमृता, जो सब रिकॉर्ड कर रही है… शायद ये सब कहानी उसी ने बनाई है।”


अमृता चीखी –

“तुम पागल हो गए हो? मैं पत्रकार हूँ। सच सामने लाना मेरा काम है।”


धीरे-धीरे सब एक-दूसरे से लड़ने लगे।

अब दोस्ती और भरोसे की जगह बस शक और डर ने ले ली थी।



हवेली की गुप्त डायरी

उस दोपहर, अनन्या ने हवेली की पुरानी लाइब्रेरी में एक डायरी खोजी।

उसकी जिल्द धूल और खून के दाग़ों से भरी हुई थी।


डायरी खोलते ही पुराने, हिले हुए शब्द सामने आए:


"ये हवेली उन दस गुनहगारों के खून से सनी है, जिन्होंने इस टापू के मालिक की बेटी का कत्ल किया था। श्राप यही है—हर सौ साल में दस लोग चुने जाते हैं। और वे सब यहाँ मरते हैं। कोई भी बचकर नहीं जाता।"


सबके चेहरों का रंग उड़ गया।

मतलब, वे किसी अदृश्य श्राप का हिस्सा बन चुके थे।



चौथा कत्ल

रात आई तो सब डर के मारे एक कमरे में बैठे थे।

लेकिन अब भरोसा खत्म हो चुका था। हर कोई दूसरे की हर हरकत पर नज़र रख रहा था।


अचानक हवेली की घड़ी ने बारह बजाए।

एक पल के लिए सबने चैन की साँस ली कि कोई हादसा नहीं हुआ।


लेकिन तभी… बिजली जैसी चीख गूँजी।

सब दौड़े और देखा—


कविता (गृहिणी) छत से उल्टी लटक रही थी, रस्सी से उसका गला कस चुका था।

उसकी आँखें फटी हुई थीं और मुँह से खून टपक रहा था।


राघव ने डरते हुए कहा –

“ये इंसानी दिमाग़ से बाहर है। कोई हमें खेल की तरह मार रहा है।”


जयदीप ने ठंडी आवाज़ में कहा –

“नहीं… ये इंसानी खेल ही है। और हत्यारा हमारे बीच है। श्राप सिर्फ़ बहाना है।”



टूटते हुए लोग

अब सिर्फ़ छह लोग बचे थे।

हर कोई नींद और डर से टूट चुका था।

किसी को भूख नहीं थी, किसी को प्यास नहीं लग रही थी।

बस एक ही ख्याल—अगला नंबर किसका होगा?


विक्रम ने बोला –

“हमें यहाँ से निकलना होगा। वरना कल तक हम सब मर जाएँगे।”


अमृता ने उसकी ओर देखते हुए कहा –

“अगर निकल भी गए, तो हत्यारा हमारे साथ ही रहेगा।”



✨ भाग 3 का अंत –

अब तक चार मौतें हो

 चुकी थीं। डर, शक और मौत का खेल अब और तेज़ हो गया था।

लेकिन डायरी का श्राप और इंसानी शक के बीच सच अभी भी अंधेरे में था।

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